अधर में मजदूर
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मेरे दर्द का मंत्र परिजनों संग है,
शकून का टौनिक वही पुराना है।
आज घर गांव का महत्व हम समझे,
अब तो हमको वापस घर जाना है।

रूखी-सूखी छिन गई रोटियाँ,
मालिक ने भी किया किनारा है।
मजदूर हूं मै-मजबूर हूं इतना,
मेरा सोने का नहीं ठिकाना है।

लम्बा सफर और नन्ने-मुन्ने संग,
किसी के पेट में नही निवाला है।
उखड़ी है सांस-दुखने लगे छाले,
अब जल ‘पी’ कर भी सफर चलाना है।

अब राह क्या रोकेंगी विपदायें,
साधन न सही-पैदल ही जाना है।
ज्वर में हैं नन्ने-भूख या धूप से,
माँ करे “कै” – पर प्राण सम्भाला है।

हमको ट्रक-टैम्पो से कहीं उतारा,
हताष कहाँ खड़े- मार्ग अंजान है।
हम चल पडे जिधर मार्ग वही थे बंद,
खुला फुटपाथ बना आशियाना है।

धन की औकात को वक्त दिखा रहा,
धन की ऐंठ को “बंद” ने सुधारा है।
चौबट बजार मे नौट लिए घूमें,
भय ने दुगना धन भी धुत्कारा है।

प्यार दुलार कभी हमने भी देखा,
धुत्कार पर अतीत याद आया है।
कैसे दें सेवा बेहाल शहर मे,
“यम” ने डेरा हर बाट लगाया है।

सोच रहे दिशा -किधर है शौचालय,
किसी ने अनुवार्यता को टाला है।
कुछ असहनिय हुई नारी को भय यही,
रिस्तों से घुंघट हटने वाला है।।

घर के करीब अभागे हुए बेदम,
मंजिल तक पहुंचा किस्मत वाला है।
हम घर न घाट-अधर में रहे लटके,
साधन खुले तो प्राण लौटाया है।

वहाँ शकून के खेत,पवन है प्राण,
स्नेह भरा गाँव,मधुर अफसाना है।
बैठूँगा मुंडेर पर, करूँगा मंथन,
भाग्य, तेरा उर्म से क्या वादा है?

Bijender Singh Bhandari, First Hindi Blogger on WEXT.in Community is retired Govt. Employee born in 1952. He is having a Great Intrest in Writing Hindi Poems.

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