मेरा इस दिल्ली मे जन्म हुआ था
ये सुन्दर शहर तब दिल मे बसा था
कल्पना न थी जो दशा है शहर की
हर शख्स व फिज़ा होगी सोचनिय भी।

साँस के नाम पर धुँआ सटकता हूँ
खाने मे मिलावटों से डरता हूँ
पानी संग कुछ तो मैला निगलता हूँ
जाम मे फंसा मै तनाव सहता हूँ।

पहले तो मेरा भी दिल था ऐसा
क्यों जाऊँ यहाँ की गलियाँ छोडकर
अब तो शंका लिये सदा सोचता हूँ
कैसे निकलूँ इन गलियों मे घुसकर।

दो मुह के शहरी,बैचेनी बहुत है
बर्तना हो जब,परखना है पडता
वो आदम दिखता है मदद को ,मगर
तनहाई मे जानवर निकलता है।

खडे राह मे बेखौफ भेडिये हैं
वो तंज कसें, कभी बौन्सर बनते हैं
जख्म ना कुरेदो शहरी तप रहे हैं
शराफत से हूँ, पर दम घुट रहा है।



ये इमारतिय शहर खूब दिखता है
पर असमाजिस सब मलीन करता है।
नियम उल्लंघन अब फैशन दिखता है
मान का रक्षक “मोन व्रत” रखता है।

तब रिस्तों को यहाँ मान मिलता था
हों कहीं -दिल खुली किताब दिखता था
स्नेह था तब -अब अपनों से डरा हूँ
मै भाग्य के बल सब कुछ निबटता हूँ।

कभी चलते-चलते चौंक जाता हूँ
करीब अनहोनी का भ्रम पाता हूँ
क्यों कि, चल रहा था संग मेरा साया
उसे कुतत्व समझ कर भय खाता हूँ।

जहाँं देखो धोखा भ्रष्टाचार है
टकों के लिये क्या हम? बौने हैं सब
क्या माँ-बाप? सब रिस्तों की हार है
स्वार्थ पर उठती,रेत की दिवार है।

सफर मे अजनबी से भय लगता है
बालाओं पर ‘गिद्द’ कहर पडता है
रक्षक ही जब भक्षक बन कर उभरे
इन्सान वहाँ रोज-रोज मरता है।



घर बना रोम- रोम कर्ज चढ़ता है
‘शादी शो’ पर दिवाला निकलता है
‘विद्दुत’ की लुका छिपि से दिल जलता है
बिना ‘जल’ माहौल भी उग्र दिखता है

‘तैस’ का प्रदुषण सब पर दिखता है।
आग मे उबला, आग मे गिरता है
नम्र बनो शहरो,क्या और गम हैं कम
‘नमन’ है निवारक,पुरूषार्थ दिखता है।

दिल्ली मे “नेकी” फिर भी बसता है
बधाई उनको,जो साँस चलता है
पग-पग कैसे जीते हो संघर्ष कर
क्या यम तुम्हारा गुलाम लगता है?

निर्भय नित नई वारदात हो रही
क्यों दोषी अभय,निर्दोष डरता है?
जेल को दुष्ट जब घर समझ रहे हों
फिर सलाखों से भय किसे लगता है?

आकाओं कुछ करो, शहर जलता है
सिर्फ वादों से रोग कब कटता है?
क्या तोप खोलेंगी निद्रा तुम्हारी?
दिल्ली का “बद” इतिहास बन रहा है।

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Author

Bijender Singh Bhandari, First Hindi Blogger on WEXT.in Community is retired Govt. Employee born in 1952. He is having a Great Intrest in Writing Hindi Poems.

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