“भूलता है आदमी” – Poetry

उर्म बढने का भ्रम सबको, होता है जन्म दिन पर
घटते वर्ष का सत्य तो भुल जाता है आदमी।

जब तन तंत्र पर अपना असर, दिखाती है ये उर्म
तिल-तिल देहनियम अवरूद्ध, हो जाता है आदमी।

वहाँ रब की मेहर देखी, आत्मा का सत्य जाना
फिर शमशान से निकल कर, सब भूलता है आदमी।

मस्त होकर जहाँन से, वो समेटता है सभी कुछ
भूलता वो लौटना है, किसी तय दिन तक आदमी।

शक,तर्क, तुनक भरे जो, खो रहे वो सादगी
भुलते खुदा की लाठी,जब जवानी मे हो अादमी।

नशे की लत, खोटी नज़र, नुक्कड मे कटी जिन्दगी
अमर्यादित हो,पुरूस्कृत सा, हँस रहा है आदमी।

दुख की दवा तो सत्संग है, छन्नी मान कर बैठो
यहाँ से छनकर ही उस पार, निकलता है आदमी।

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