Author: Bijender Singh Bhandari

Bijender Singh Bhandari, First Hindi Blogger on WEXT.in Community is retired Govt. Employee born in 1952. He is having a Great Intrest in Writing Hindi Poems.

​अक्सर ऐसा क्यों होता है

​मेरे कृषि प्रधान देश मेअक्सर ऐसा क्यों होता हैकृषिक तो भूखा मरता हैसहुकार चैन से सोता है। बीज बोये कुछ थे खोखलेक्यों कोई उसको छलता हैजो माटि ‘सिर’ धर है पूजतावही सिर धरा-धर रोता है। भर जायें खलिहान कभी जो…

इस गिरगिट के रंग सात

इस सतरंगी दुनिया मे,एक अनोखी जात नित बदल कर रूप धरे,ये चम्चों की बात बलि चढें सही-गलत, ये ऐसी बुनते घात कब तक बकरेखैर करें,संग कसाई जात। जैसे कसाई घाँस दे,बकरे को दिन रात महाजन सूद बढे,खातों मे बेबात चले…

अब दिल्ली मे दम नही

मेरा इस दिल्ली मे जन्म हुआ था ये सुन्दर शहर तब दिल मे बसा था कल्पना न थी जो दशा है शहर की हर शख्स व फिज़ा होगी सोचनिय भी। साँस के नाम पर धुँआ सटकता हूँ खाने मे मिलावटों…

अदभुत गुण सागर “माँ”

माँ की ममता का मोल नही होता करूणा भी कोई तोल नही सकता माँ की मधुर डाँट रस्ते बुनती है दुर्गम पथ आशीष लिये कटते हैं कैसे रैन -चैन माँ शिशु पर वारी मुझे विश्राम समय अनुभव होते है माँ-सागर…

ऐसे पराक्रमी को नमन हमारा

संगीन थामे तुम सीना चौडा कर गर्जते-शेर की मानिंद चलते हो दुश्मन देखे, उसे कम्पन हो जाती हमवतनों का हौंसला बढता है। कभी पल्ख झपकी कि मौत हो सम्मुख सदा सजग तुम्हें रहना पडता है हम सुख निंद्रा लें या…

मेरी अभिलाषा

व्यर्थ जीवन गया, क्या दुनियाँ को दिया? क्यों जन्मा था ? क्यों रहे याद हमारी? शहादत न सही, कुछ करता हितकारी युगों तक ‘जय’ करती, ये दुनियाँ सारी। हजरत मुझे थी, वतन के काम आऊँ कुटुम्ब तक सिमट गई हजरतें…

तेेरी दौलत – Hindi Poetry

हमदर्द खाक पर दिखा नही ना स्वर उठा ‘यह बुरा हुआ’ मन मे हर्ष-आँसू “मगर के’ तुमसा कंगाल न कोई मरा, जोड़ के पैसा -हाय पैसा अन्तिम क्षण तक हाय पैसा बहुत बडा है  पैसा,लेकिन सभी कुछ नही होता पैसा।   तेरी दौलत, तेरे बच्चे बच्चे भी कुछ हों-पर अच्छे पैसा क्या है?मैल बराबर खतरे का संकेत बराबर मानस जन्मा पारस जैसा तू बन जा बापू के जैसा बच्चे बने श्रवण के जैसा घर होगा मन्दिर के जैसा।   मान खरीद, ईमान खरीद पैसा मिला,अभिमान खरीद सभी दुर्लभ सामान खरीद क्या मृत्यु टाल सके पैसा? प्राकृित कोप -न रोके…

कुछ पेड लगा – Hindi Poetry

हरियाली की हत्या कर डाली ‘डाली-डाली’ यहाँ काट डाली विकास कार्य से कंक्रीट बढा कर धरा विनाश की नीव धर डाली। जल ‘भू गर्व ‘ मे सिकुड रहा है ‘भू मंडल’ तपता है बिन डाली सभी मौसम बदल रहे जंगल…

“नेक गय्या” – Poetry

इक दिन ‘बछिया’ बोली गय्या से मय्या, हम जन्में क्या पाया है? हम नर हितकारी सिंग से खुर तक क्यों बध कर बनते निवाला हैं? ये खग, पशु क्या जलचर खा जाते नर असुर सोच दिल के काले हैं क्यों…

“हिन्द की फौज” – Poetry

हम नम्र को नमन,मित्र को अर्पण हिमालय जैसी भारतिय फौज है आँच ना आये, हमवतन चैन लो तिरंगे की सौं,प्रथम यह शीश है। क्यों हिन्द ना रास आता उनको क्यों कि, भू खण्डों पर नियत खास है हम चमक रहे…

“नदी अपेक्षा करती है” – Poetry

“नदी अपेक्षा करती है” हिमगिरि को जब गर्मी लगती है सहस्रों बूँदें रिसने लगती है मिलन जिस धरातल पर होता है नदी वहीं से बहने लगती है। बूँद-बूँद की संयुक्त सभा मे नव उद्दगम पर हर्षित होती है बाहें थामे…

Holi Special : आस्था  पर्व

कई पर्व हैं हिन्द में हम रस लेते संग-संग क्यों गर्भ न हों बाशिंदों इस महक से जग है दंग। होली की उमंग चढे तुम संयम का दो दान सदभावना बनी रहे वो चाहे तब रंग डाल। पर्व का अर्थ…

International Women’s Day Special : साहस

मै देख तो रही थी सब कुछ फिर क्यों दर्शाती अँधी हूँ? मै सुन भी लेती थी सब कुछ फिर क्यों दिखाती बहरी हूँ? मै बोला करती हूँ सब कुछ फिर क्यों बन गई गूँगी हूँ? मै चुप रही समझ…

उर्म बढने का भ्रम सबको, होता है जन्म दिन पर घटते वर्ष का सत्य तो भुल जाता है आदमी। जब तन तंत्र पर अपना असर, दिखाती है ये उर्म तिल-तिल देहनियम अवरूद्ध, हो जाता है आदमी। वहाँ रब की मेहर…

“वोट की राजनीति है ऐसी” – Poetry

यहॉ वोट की राजनीति है ऐसी हाथ जोड, फिर कर एेसी की तैसी तू शब्द जाल से मस्तक बुन सबका फिर पल्टी खा,झुठे वादों पर ‘जी’ शब्द ‘तोड मरोड’ दिये कहकर मुकर मौके की नजाकत देखना जैसी । यहॉ बोट…

“अातंक फैलाने से क्या होगा” – Poetry

“अातंक फैलाने से क्या होगा ?” अातंक फैलाने से क्या होगा ? कुछ लहु गिरेगा-धुँआ उठेगा दहशत से हमे डरा पाअोगे हम जैसे हैं- वैसा पाओगे। खेल मौत का जो तुम खेलोगे उस पर दहशत तुम भी झेलोगे फिर लुक-छिप…

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