Category: Hindi

​अक्सर ऐसा क्यों होता है

​मेरे कृषि प्रधान देश मेअक्सर ऐसा क्यों होता हैकृषिक तो भूखा मरता हैसहुकार चैन से सोता है। बीज बोये कुछ थे खोखलेक्यों कोई उसको छलता हैजो माटि ‘सिर’ धर है पूजतावही सिर धरा-धर रोता है। भर जायें खलिहान कभी जो…

हमरा घर बार 

आठ दस भाई बहनों का घर था हमारा, किसने किसका बच्चा नहलाया पता नहीं, घर की हर महिला नहाने से पहले एक बार घर की चांदमारी करती कितने अवेलेबल हैं, जितने मिल जाते वो नहा जाते, फिर अगली खेप में…

हमरी तिरछी नजरिया

पनवाड़ी चच्चा… पन्ना लाल कुछ कहना चाहता हूँ, क्योंकि चीखना चाहता हूँ, चिल्लाना चाहता हूँ सबसे छुप कर भी रोना चाहता हूँ. ऐ शहर तुझी में जन्मा, यहीं गंगा की रेत में धुनी जमाते हुए बलखा, यहीं पे खुली हवाएं…

इस गिरगिट के रंग सात

इस सतरंगी दुनिया मे,एक अनोखी जात नित बदल कर रूप धरे,ये चम्चों की बात बलि चढें सही-गलत, ये ऐसी बुनते घात कब तक बकरेखैर करें,संग कसाई जात। जैसे कसाई घाँस दे,बकरे को दिन रात महाजन सूद बढे,खातों मे बेबात चले…

अब दिल्ली मे दम नही

मेरा इस दिल्ली मे जन्म हुआ था ये सुन्दर शहर तब दिल मे बसा था कल्पना न थी जो दशा है शहर की हर शख्स व फिज़ा होगी सोचनिय भी। साँस के नाम पर धुँआ सटकता हूँ खाने मे मिलावटों…

अदभुत गुण सागर “माँ”

माँ की ममता का मोल नही होता करूणा भी कोई तोल नही सकता माँ की मधुर डाँट रस्ते बुनती है दुर्गम पथ आशीष लिये कटते हैं कैसे रैन -चैन माँ शिशु पर वारी मुझे विश्राम समय अनुभव होते है माँ-सागर…

ऐसे पराक्रमी को नमन हमारा

संगीन थामे तुम सीना चौडा कर गर्जते-शेर की मानिंद चलते हो दुश्मन देखे, उसे कम्पन हो जाती हमवतनों का हौंसला बढता है। कभी पल्ख झपकी कि मौत हो सम्मुख सदा सजग तुम्हें रहना पडता है हम सुख निंद्रा लें या…

मेरी अभिलाषा

व्यर्थ जीवन गया, क्या दुनियाँ को दिया? क्यों जन्मा था ? क्यों रहे याद हमारी? शहादत न सही, कुछ करता हितकारी युगों तक ‘जय’ करती, ये दुनियाँ सारी। हजरत मुझे थी, वतन के काम आऊँ कुटुम्ब तक सिमट गई हजरतें…

तेेरी दौलत – Hindi Poetry

हमदर्द खाक पर दिखा नही ना स्वर उठा ‘यह बुरा हुआ’ मन मे हर्ष-आँसू “मगर के’ तुमसा कंगाल न कोई मरा, जोड़ के पैसा -हाय पैसा अन्तिम क्षण तक हाय पैसा बहुत बडा है  पैसा,लेकिन सभी कुछ नही होता पैसा।   तेरी दौलत, तेरे बच्चे बच्चे भी कुछ हों-पर अच्छे पैसा क्या है?मैल बराबर खतरे का संकेत बराबर मानस जन्मा पारस जैसा तू बन जा बापू के जैसा बच्चे बने श्रवण के जैसा घर होगा मन्दिर के जैसा।   मान खरीद, ईमान खरीद पैसा मिला,अभिमान खरीद सभी दुर्लभ सामान खरीद क्या मृत्यु टाल सके पैसा? प्राकृित कोप -न रोके…

कुछ पेड लगा – Hindi Poetry

हरियाली की हत्या कर डाली ‘डाली-डाली’ यहाँ काट डाली विकास कार्य से कंक्रीट बढा कर धरा विनाश की नीव धर डाली। जल ‘भू गर्व ‘ मे सिकुड रहा है ‘भू मंडल’ तपता है बिन डाली सभी मौसम बदल रहे जंगल…

“नेक गय्या” – Poetry

इक दिन ‘बछिया’ बोली गय्या से मय्या, हम जन्में क्या पाया है? हम नर हितकारी सिंग से खुर तक क्यों बध कर बनते निवाला हैं? ये खग, पशु क्या जलचर खा जाते नर असुर सोच दिल के काले हैं क्यों…

“हिन्द की फौज” – Poetry

हम नम्र को नमन,मित्र को अर्पण हिमालय जैसी भारतिय फौज है आँच ना आये, हमवतन चैन लो तिरंगे की सौं,प्रथम यह शीश है। क्यों हिन्द ना रास आता उनको क्यों कि, भू खण्डों पर नियत खास है हम चमक रहे…

उलझने – 2 : Deepti Singh

अगले दिन(ऑफ़िस में)….. सलोनी बहुत शांत अपने डेस्क पर काम कर रही है। उसकी आँखों से कोई भी साफ़ बता सकता है। वो पूरी रात सोयीं नहीं है। सलोनी आज इतना जल्दी ऑफ़िस कैसे? कल तो तुम लेट गयी थी…

“नदी अपेक्षा करती है” – Poetry

“नदी अपेक्षा करती है” हिमगिरि को जब गर्मी लगती है सहस्रों बूँदें रिसने लगती है मिलन जिस धरातल पर होता है नदी वहीं से बहने लगती है। बूँद-बूँद की संयुक्त सभा मे नव उद्दगम पर हर्षित होती है बाहें थामे…

उलझने – 1 : Deepti Singh

कभी इतनी बारिश नहीं हुई, आज पता नहीं ऐसा क्या हो गया। आज कैसे भी टाइम पर ऑफ़िस पहुँच जाऊँ।सब कुछ आज ही होना था। ये बारिश, प्रेज़ेंटेशन और बॉस का हेड ऑफ़िस से लोगों का ऑफ़िस में आना। ऑटो…

#दुबारा : Deepti Singh

#newStory #दुबारा आज वैसे ही बहुत देर हो चुकी क्लास के लिए कीर्ति जल्दी से अपनी किताबों को समेटतीं है, जो लाइब्रेरी की मेज़ पर बिखरीं हुई है। वो जैसी ही किताबों को हाथ में लिए मुड़ती है। एक दम…

मुलाक़ात गज़ल : Deepti Singh

एक अजनबी सी मुलाक़ात ख़ुद के साथ हुई ज़िन्दगी के मोड़ पर मंज़िल की तलाश में खड़ी थी ख़ुद से ही पता पूछ रही थी मैं बड़ी अजीब सी बात मेरे साथ हुईं जब ख़ुद से यूँ अजनबी सी मुलाक़ात…

तुम हम और इश्क़ : Deepti Singh

तुम्हें चाहना ही तो काम है मेरा बड़ी मन्नतो से ज़िन्दगी को पाया है।। तुम्हारे पास हर किसी के लिए वक़्त है, लेकिन तुम्हें ये याद नहीं है। कोई और भी है तुम्हारी ज़िन्दगी में। सच ही कहते है लोग,…

Holi Special : आस्था  पर्व

कई पर्व हैं हिन्द में हम रस लेते संग-संग क्यों गर्भ न हों बाशिंदों इस महक से जग है दंग। होली की उमंग चढे तुम संयम का दो दान सदभावना बनी रहे वो चाहे तब रंग डाल। पर्व का अर्थ…

International Women’s Day Special : साहस

मै देख तो रही थी सब कुछ फिर क्यों दर्शाती अँधी हूँ? मै सुन भी लेती थी सब कुछ फिर क्यों दिखाती बहरी हूँ? मै बोला करती हूँ सब कुछ फिर क्यों बन गई गूँगी हूँ? मै चुप रही समझ…

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